असहाय मैं और छोटू

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कुछ लिखने के लिए कुछ देखना जरुरी है देखने से ज्यादा उसे समझना और महसूस करना जरुरी है और उससे भी ज्यादा उस अहसास से कुछ सीखना जरुरी है। सीखकर अपने जीवन में उसे लागू करना भी जरुरी है ।अक्सर हम देखते तो है समझते भी है और समझदारी के अहसास से सीखते भी है लेकिन सीख के उस अहसास और समझदारी को ठन्डे बस्ते में डालकर बढ़ जाते है । शायद हमें लगता है उस अहसास उस समझदारी को अपनी जिंदगी में लागू करने के लायक नहीं है ।

लेकिन अगर हम महसूस कर सकते है समझ सकते है तो हम उस जिम्मेदारी के लिए भी तैयार है अन्यथा हम समझते ही क्यों?

आप सोच रहे होंगे अहसास जिम्मेदारी समझदारी क्या बला है ?
अनभिज्ञ बनने की कोशिश मात्र है ये ।

ऑफिस के बाहर का ढाबा हो या चाय की दुकान .. हम रोज जाते है रोज एक नाम बुलाते है … छोटू …सबने ही देखा होगा वो छोटा बच्चा .. आपने अहसास किया वो छोटा है.. इस दुकान पे काम करने लायक नहीं है .. ये उम्र उसके यहाँ काम करने की नहीं है .. अब बारी आती है समझदारी की .. हमारे अंदर की संवेदना हिलोरे मारती है .. हम जानते है की उसका यहाँ काम करना गैरकानूनी है .. हममे से कई लोगो ने कई बार संवेदना के ज्वार से आहत होकर पूछा भी होगा छोटू क्यों करते हो यहाँ काम ?? ..स्कूल जाते हो ?? .. आमतौर पर उत्तर यही मिलते है के घर वालो ने बोला .. पैसे के लिए … या घर में कोई कमाने वाला नहीं है .. मन विह्वल होता है .. कई बार हम कुछ पैसे उसकी जेब में डाल देते है ..बहुत मेहरबानी साहब..  सोचते है हम क्या कर सकते है . हा हम कर ही क्या सकते है .. अगले ही पल सारी संवेदनाओ का ज्वार भाटे में बदल जाता है ..और उन्हें हमें किसी फालतू फोल्डर की तरह रीसायकल बिन में डाल के आगे बढ़ जाते है .. अगले दिन फिर वो फोल्डर अपने आप से उसी चाय की दुकान पर रिस्टोर हो जाता है …

अब क्या करे आदत सी हो गयी है अब उस बच्चे के प्रति संवेदना जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है ..कई बार सोचता हु शिकायत दर्ज़ करायी जाये .. पर क्या ये ज्यात्ती नहीं होगी उसके साथ .. मजबूरिया तो रही ही होंगी कुछ .. नहीं तो खेलने कूदने की उम्र में चाय के गिलास क्यों धो रहा होता वो .. क्या उसका मन नहीं करता होगा अच्छी सी ड्रेस पहनकर स्कूल जाऊं . खेलु कूदू?

फिर लगता है अगर उसका काम बंद करा दिया और उसके घर की कमाई का यही एक जरिया हो तो रोटी कोन देगा उसके परिवार को .. साहब सारा दोष तो इस पापी पेट का ही है। और तब सारा देखना समझना महसूस करना धरा का धरा रह जाता है एक मन में टीस उठती है और अपने आपको असहाय पाता हूँ।

पर एक तरफ मैं देश के राजनितिक परिद्श्य को बहुत बारीकी से देखता हु इसलिए एक उम्मीद देश की राजनीतीे से भी बनती है जहा एक चाय वाला प्रधानमन्त्री बनता है .. की वो तो कम से कम इन बच्चों का दर्द समझेगा .. पर निराशा तब होती है जब 1 वर्ष से जादा का समय बीत गया पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया .. मेरी समझ तो उतनी नहीं पर हो सकता है कोई अड़चन हो.. क्या होगा जब इतने बच्चे जो अपना घर चलाते है वो कम करना बंद कर देंगे ..

क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब चाय की दुकान पर छोटू नहीं होगा ..क्या इन बच्चों को छोटू नहीं इनके असली नाम की पहचान मिलेगी? .. क्या ये छोटू कभी स्कूल जायेगा? क्या ये छोटू कभी पढ़कर बड़ा आदमी बनेगा? आखिर १/१२५ करोड़  भारत तो ये भी है। पर इस १/१२५ करोड़ भारत का विकास कब होगा ?

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Because Things are Easier said than done..

Beggar-help-574844So this was just-another-day-in-office with the same this-must-go-out-today work and little intervals of very precious time that you somehow manage to steal from that hectic schedule for yourself. Whether it’s total nonsense conversation that you have on lunch table with your colleagues, which basically consist of jokes specially made on you 😛 or two gals discussing their diet or recipe of this new dish or the evening tea time with some insightful conversations. Nonetheless this isn’t what this post is about. Okay, where was I?? Yupp!! So just-another-day-in-office was over and I was in cab as usual travelling home which takes minimum 2hrs and max 4hrs (yupp four f****ing hrs is my max 😛 and trust me it can get worse). So what I’m trying to say is that I spend a whole lot of time in cab and trust me this can be a real pain in the neck( actually I do have a pain in the neck because of sleeping in most uncomfortable position in cab, m sure other cab travelers can relate to that). Well, having good cab mates makes that pain a little bearable.

So I was in cab chit chatting with my cab mates and complaining about how having the first pickup and last drop sucks, how lame the new driver is for playing those stupid songs from his I’ve-never-heard-this-song-before and I-love-Sallu collection and many other things. Just then the car stops at this red light and as I look outside the window I see this very old man, feeble and in his 70’s or 80’s, walking barefoot on concrete road with the help of a stick and he approaches our car and knocks at the window. He begged with folded hands and as I looked at this I grabbed my bag and started looking for my wallet. While I was searching frantically for my wallet, I remembered this “Big Speech” I gave to my cab mates day before that incident about why we should not pay anything to these beggars, how our paying them is giving rise to so many homeless (or kidnapped) children being mutilated­­­ for this begging business and how the only way to stop this is not to pay them. My own words were playing like a recorder in my head and then there was this man standing in front of me with folded hands, I just wanted to help him. Seeing him like that just broke me a little and at the same time made me realize that our problems are nothing as compared to what these people are dealing with. I mean I wonder what will I have in dinner today and they wonder if they will be lucky enough to arrange a dinner at all. These people have actually seen their loved ones dying in front of them because of hunger and poverty. Ohkayy!! went a little off the track. I guess you’d be wondering what I did? Did I give him the money? So, while I was wondering and searching for my wallet, my cab mate quickly took out a coin from her purse and gave it to him. I was Relieved that I didn’t give him the money and yet happy that he got it. Yeahh I know, that’s Bad and you know why? Because things are easier said than done. But I ask you “did I do the right thing?”

P.S : I am an amateur writer(this being my First post) and my English… 😉